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उनका भी अपराध

Saturday, May 9, 2009



सघन वन में भ्रमण करते हुए महर्षि वाल्मीकि ने एक क्रौंच युगल को प्रेम में व्यस्त पाया. अभी वाल्मीकि उनकी बाल सुलभ चंचलता पर प्रफुल्लित हो ही रहे थे कि किसी व्याध द्बारा छोड़ा गया एक बाण कहीं से आया और उसने नर क्रौंच के प्राण ले लिए.
भूमि पर गिरकर तड़पते हुए नर क्रौंच और ऊपर करुण विलाप करती हुई क्रौंची को देख कर वाल्मीकि घोर शोक में डूब गए और क्रोध के वश में आ कर उनके मुख से अनायास ही निकल पड़ा :

" मा निषाद! प्रतिष्ठाम्त्वम्गम शाश्वातिसम |
यत् क्रौन्च्मिथुनदेकम्वधि काममोहितम || "
" हे निषाद (व्याध) ! तू अधिक दिनों तक प्रतिष्ठित (जीवित) नहीं रह सकेगा क्योंकि तुने क्रौन्चों के जोड़े में से प्रेम में डूबे हुए क्रौंच का वध किया है "

इस श्राप से जन्म हुआ वाल्मीकि रामायण का जहाँ क्रौन्चों के स्थान राम - सीता ने लिए और लंका नरेश रावण बना व्याध!

जाने कितनी सहस्त्राब्दियों के बाद एक और क्रोधित कवि रामधारी सिंह दिनकर ने एक नए सन्दर्भ में उस अध्याय कि विवेचना करते हुए लिखा:
"समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध !
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध ! "

कितने आश्चर्य कि बात है कि सदियाँ बीत गयी लेकिन कथा वही कि वही है. आज के परिदृश्य में क्रौंची है जनता, वधित क्रौंच है जनता के अधिकार और व्याध है हमारी व्यवस्था के ठेकेदार. विडम्बना यह है कि अब वाल्मीकि भी स्वयं जनता ही है जो कि सिर्फ प्रलाप करते हुए व्याध को कोस भर सकती है, प्रतिरोध नहीं करती, संघर्ष के लिए हुंकार भरकर उठ खड़ी नहीं होती ...

... प्रजातंत्र के इस नाटक में वाल्मीकि का वो श्राप आज कितना निष्फल प्रतीत होता है !

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है !

Sunday, March 8, 2009

भारतवर्ष आज फिर एक दोराहे पे खडा है. एक और चुनाव सन्निकट है और जनता के सामने ये प्रश्न है कि वो अपना मत किसे दे? कौन हो हमारा नेता? क्या वो जिन्होंने अभी अभी अदालतों में अर्जी दी है कि उन्हें सजामुक्त किया जाए ताकि वो चुनाव लड़के अपराधी से हमारे लिए कानून निश्चित करने वाले बन सके? या वो जिनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य अपनी संपत्ति बढ़ाना और ज्यादा से ज्यादा अपनी आदमकद मूर्तियाँ चौक चोराहों पे लगवाना है? क्या जनता उन्हें अपना भाग्य विधाता चुन ले जो खुले आप तरह तरह के अपराधों में लिप्त हैं? क्या भारत उन्हें अपना नेता चुनेगा जिनके लिए अपना धर्म, अपनी भाषा और अपने राज्य का कथित स्वार्थ अपने देश से ऊपर है? जनता क्या उन सत्ता के दलालों को अपनी इज्ज़त सौप रही है जिन्हें देश को बेच आने में जरा भी शर्म नहीं आती?
इस बार सवाल धर्म, जाती या भाषा का नहीं है. सवाल है एक आम आदमी के स्वाभिमान का, उस स्वाभिमान का जिसकी बलि हर रोज सत्ता के गलियारों में और सरकारी दफ्तरों की मेज पर चढ़ती है. सवाल यह है क्या जनता सचमुच उतनी दंतहिन् , विषहीन , विनीत, सरल है जितना नेताओं और बाबुओं ने समझ रखा है? क्या जनता फिर से ५ साल लुटने और बेवकूफ बनने के लिए तैयार है? क्या जनता अब ये कहने के लिए तैयार है कि बस! अब और नहीं! अब तो जनादेश बदलाव के लिए होगा? क्या जनता नेताओं और बाबुओं को ये बताने कि लिए खड़ी होगी कि वो हमारे मालिक नहीं नौकर हैं? क्या जनता इन लोगों को उनकी औकात बता सकेगी?

क्या एक आम आदमी उठ कर ये हुंकार भर सकेगा?

"दो राह समय के रथ का घरघर नाद सुनो !
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है !!!"