दुष्यंत कुमार की अनमोल नज्मे

Friday, May 16, 2008

यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये...
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कौन कहेगा हुकूमत से, कौन समझेगा
एक चिडिया इन धमाकों से सिहरती है ...
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वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये...
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कौन कहता हिया आकाश मे सुराख नही हो सकता
एक पत्थर तो तबियत से उछालों यारों ...
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एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है...
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सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
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मौत ने तो धर दबोचा एक चीते की तरह
ज़िंदगी ने जब छुआ फासला रखकर छुआ...
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इस शहर मे बारात हो या वारदात
अब किसी भी बात पर खुलती नही हैं खिड़कियाँ...
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कल मिला वो महफ़िल मे मुझे चिथरे पहने हुए
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान हूँ...
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2 comments:

Attila said...

waah! magnificient.. are you a professional hindi poet??

Da Eternal Rebel said...

No Attila, these are the poems by Late Dushyant Kumar Tyagi .. I write but little