सिंहासन खाली करो कि जनता आती है !

Sunday, March 8, 2009

भारतवर्ष आज फिर एक दोराहे पे खडा है. एक और चुनाव सन्निकट है और जनता के सामने ये प्रश्न है कि वो अपना मत किसे दे? कौन हो हमारा नेता? क्या वो जिन्होंने अभी अभी अदालतों में अर्जी दी है कि उन्हें सजामुक्त किया जाए ताकि वो चुनाव लड़के अपराधी से हमारे लिए कानून निश्चित करने वाले बन सके? या वो जिनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य अपनी संपत्ति बढ़ाना और ज्यादा से ज्यादा अपनी आदमकद मूर्तियाँ चौक चोराहों पे लगवाना है? क्या जनता उन्हें अपना भाग्य विधाता चुन ले जो खुले आप तरह तरह के अपराधों में लिप्त हैं? क्या भारत उन्हें अपना नेता चुनेगा जिनके लिए अपना धर्म, अपनी भाषा और अपने राज्य का कथित स्वार्थ अपने देश से ऊपर है? जनता क्या उन सत्ता के दलालों को अपनी इज्ज़त सौप रही है जिन्हें देश को बेच आने में जरा भी शर्म नहीं आती?
इस बार सवाल धर्म, जाती या भाषा का नहीं है. सवाल है एक आम आदमी के स्वाभिमान का, उस स्वाभिमान का जिसकी बलि हर रोज सत्ता के गलियारों में और सरकारी दफ्तरों की मेज पर चढ़ती है. सवाल यह है क्या जनता सचमुच उतनी दंतहिन् , विषहीन , विनीत, सरल है जितना नेताओं और बाबुओं ने समझ रखा है? क्या जनता फिर से ५ साल लुटने और बेवकूफ बनने के लिए तैयार है? क्या जनता अब ये कहने के लिए तैयार है कि बस! अब और नहीं! अब तो जनादेश बदलाव के लिए होगा? क्या जनता नेताओं और बाबुओं को ये बताने कि लिए खड़ी होगी कि वो हमारे मालिक नहीं नौकर हैं? क्या जनता इन लोगों को उनकी औकात बता सकेगी?

क्या एक आम आदमी उठ कर ये हुंकार भर सकेगा?

"दो राह समय के रथ का घरघर नाद सुनो !
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है !!!"

3 comments:

Kraxpelax said...

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Indyeah said...

This post confirms that discovering your blog was a stroke of luck for me!:)
The passion with which you have written these lines that
in itself says so much...
and
Ramdhari Singh Dinkar's lines never fail to move...aaj nahi jaagenge toh kab jaagenge?Ab bhi yadi hamne aankhen nahin kholin toh is desh ka bhavisya kya hoga?
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।


thank you for a poast that energises through the sheer power of words...

Da Eternal Rebel said...

@Indyeah
These two pieces of verse, the one quoted by me and the one given by you, are the ones closest to my heart. They are part of a lost dream, of a challenge thrown to the people of India which they are yet to accept. When I read those lines, I am able to feel how restless Dinkar Ji must have been feeling, because I feel the same restlessness and growing anger. I want to see the change happening in my lifetime and time is running out.